Lifafe Mein Kavita : A Satirical Take On The Changing Face Of Hindi Kavi Sammelans | Novel | Satire | Humor | Indian Literature (Hindi Edition)-Arvind Tiwari
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Lifafe Mein Kavita : A Satirical Take On The Changing Face Of Hindi Kavi Sammelans | Novel | Satire | Humor | Indian Literature (Hindi Edition)-Arvind Tiwari
About the Products:
‘लिफाफे में कविता’ आज के कवि-सम्मेलनों का एक्स-रे है। इस एक्स-रे का डायग्नोसिस बताता है कि कवि-सम्मेलन लाइलाज बीमारी से पीड़ित हो चुके हैं। साहित्य की चिड़िया अब इस पेड़ पर घोंसला बनाने से डरती है। यह पेड़ चाहता भी नहीं कि साहित्य की चिड़िया वहाँ बसेरा करे। नवीनता के रूपांतरण में कवि-सम्मेलनों ने बहुत कुछ खो दिया। बच्चन, निराला, दिनकर, महादेवी वर्मा, श्याम नारायण पांडेय जैसे साहित्यिक कवियों की विरासत को मंच की धनलिप्सा तहस-नहस कर चुकी है। अब तो विदेश में काव्य-पाठ करनेवाला चुटकुलेबाज कवि मंच पर बड़े कवि के रूप में प्रतिष्ठित हो गया है। ग्लैमर के इस नग्न रूप को देखकर शायरी शर्म के मारे बंद कमरे में जा छुपी है। कवि-सम्मेलन के करियर के लिए कई कवि और कवयित्रियाँ नैतिक और अनैतिक का भेद भुला चुके हैं। अश्लीलता की पराकाष्ठा को देखकर हिंदी भाषा खुद हैरान है। अगर यही कविता है, तो लुगदी साहित्य और कविता में क्या फर्क है। कवि-सम्मेलनों के ठेकेदारों की चतुरंगी सेना में ऐसे कवि शामिल हो जाते हैं, जिनको कविता की एबीसीडी भी नहीं आती। इसके लिए कवि ही नहीं, श्रोता भी जिम्मेदार हैं। वे पत्रिकाएँ बंद हो गईं, जो पाठकों को साहित्य और कविता से रूबरू कराती थीं। इक्का-दुक्का बची हैं, जो पाठकों के अभाव से जूझ रही हैं। इसी तरह कुछ कवि-सम्मेलन भी अपवादस्वरूप पुराने मूल्यों को बनाए हुए हैं। इस उपन्यास का नायक जोड़-तोड़ से मंच का चर्चित कवि बन तो जाता है, पर वासना के समुद्र में ऐसा डूबता है कि अंत में वह खाली हाथ अपने पुश्तैनी कस्बे में लौटकर उसी मुंशी चायवाले के यहाँ पाया जाता है, जहाँ बैठकर उसने मंच की सफलता के लिए योजनाएँ बनाई थीं। इस उपन्यास के पात्र और घटनाएँ काल्पनिक हैं, पर यथार्थ से बाबस्ता होने के कारण वास्तविक जैसी लगती हैं। मेरा मानना है कि उपन्यास में यथार्थ हो सकता है, पर यथार्थ उपन्यास नहीं होता!
Language: Hindi
Page No: 192
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