Mantra-Viplav-Tarun Vijay
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Mantra-Viplav-Tarun Vijay
About the Products:
प्रस्तुत पुस्तक का नाम जिस लेख के शीर्षक पर रखा गया है, उसमें एक वक्तव्य आता है- 'विष की एक बूँद जिसे दी जाए, उससे केवल वही एक व्यक्ति मरता है। विषैला तीर जिस व्यक्ति पर आघात करे, उससे भी केवल वही एक व्यक्ति मारा जाता है, पर अगर विचार ही भ्रष्ट हो जाए और उसकी समझ में राजा और प्रजा में संभ्रम निर्माण हो तो हे धृतराष्ट्र, उस समय मंत्र-विप्लव की स्थिति पैदा होती है, जिसमें राजा, प्रजा और राष्ट्र-तीनों का नाश हो जाता है।' यह विदुर ने धृतराष्ट्र से कहा था। इस पुस्तक के लेखों में उसी मंत्र-विप्लव की स्थिति का प्रतिकार है। उस स्थिति को रोकने टालने का जतन है। मंत्र यानी विचार। विचार ही तो प्रदूषित हो गए हैं हमारे समय में। अगर विचार शुद्ध हो जाएँ, तो सारे झगड़े खत्म हो जाएँ, महासंग्राम की स्थिति पैदा ही न होने पाए। तरुण विजय की चिंता के केंद्र में वह सबकुछ है, जो मनुष्य-विरोधी है, मानव समाज, इस जीव-जगत् के लिए अहितकर है। इस पुस्तक के लेखों में राजनीतिक अनीतियों पर प्रहार है, तो मनुष्य के लिए खतरा पैदा कर रही उन तमाम मानवीय गतिविधियों, भ्रष्ट आचरण, अधर्म, यानी मात्र व्यक्तिगत स्वार्थ के लिए चली जा रही चालों-कुचालों पर भी कठोर वैचारिक वार है। इन लेखों की प्रकृति ललित निबंधों की है, इनमें भाषा का माधुर्य मन को मोहता है।
Language: Hindi
Page No: 240
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