Deh Mann Madhyam Tumhare Yog Ka: Practicing Yoga Self-Help Book For Body And Mind-Praveen Kumar
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Deh Mann Madhyam Tumhare Yog Ka: Practicing Yoga Self-Help Book For Body And Mind-Praveen Kumar
About the Products:
ड़स काव्य-कृति में एक विशिष्ट भाव-प्रवणता लिए एककाव्य-रूपक सृजित हुआ है, जिसमें यह बिंब बनता है कि शरीर रूपी सराय में आत्मा रूपी प्रियतमा को एक निश्चित कालावधि के लिए रहना है, जिसमें उसे गत कर्मों का साक्षी भी बनना है एवं अगली यात्रा की शक्ति के आराधन पुंज भी संगृहीत करने हैं। यह तभी संभव है, जब देह विकार से मुक्त होकर स्वच्छ एवं सतत शोधन की प्रक्रिया से गुजरती रहे, ताकि 'योग:कर्मसु कौशलम्' के परिप्रेक्ष्य में कर्म की कुशलता का सुयोगप्राप्त हो सके । इसी के दृष्टिगत काया को आत्मा के प्रवास एवं इसके सतत उन्नयन के निमित्त स्वस्थ एवं निर्विकार रखना मानवदेह का परम कर्तव्य है एवं यही योग की पूर्व पीठिका है । देह एवंमन की भावानुभूति को प्रियतम से संवाद करते हुए इस काव्यकृति में देखा जा सकता है। आश्रय-अतिथि के दह्रैत मेंअद्वय रागात्मकता देह-मन-आत्मा के योग में यत्र-तत्र-सर्वत्र है और इस प्रकार एक अन्योन्याश्रित संबंध रूपक रचित हुआ है । देह मन माध्यम तुम्हारे योग का मेरी प्रकृति का पुरुष से संयोग का
Language: Hindi
Page No: 128
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